ब्रह्म
हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार
ब्रह्म ही परम तत्व है (इसे त्रिमूर्ति के
देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें)।
वो ही जगत का सार है, जगत
की आत्मा है। वो विश्व का आधार
है। उसी से विश्व
की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट
होने पर उसी में विलीन
हो जाता है। ब्रह्म एक और सिर्फ़ एक
ही है। वो विश्वातीत भी है और
विश्व के परे भी। वही परम सत्य,
सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है।
वो कालातीत, नित्य और शाश्वत
है। वही परम ज्ञान है। ब्रह्म के दो रूप
हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म। परब्रह्म
असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन
है। वो सभी गुणों से भी परे है, पर
उसमें अनन्त सत्य, अनत चित् और अनन्त
आनन्द है। ब्रह्म
की पूजा नही की जाती है,
क्योंकि वो पूजा से परे और
अनिर्वचनीय है। उसका ध्यान
किया जाता है। प्रणव ॐ (ओम्)
ब्रह्मवाक्य है, जिसे सभी हिन्दू परम
पवित्र शब्द मानते हैं। हिन्दु यह मानते
है कि ओम की ध्वनि पूरे ब्रह्माण्ड मे
गून्ज रही है। ध्यान मे गहरे उतरने पर यह
सुनाई देता है। ब्रह्म
की परिकल्पना वेदान्त दर्शन
का केन्द्रीय स्तम्भ है और हिन्दू धर्म
की विश्व को अनुपम देन है।
ईश्वर
ब्रह्म और ईश्वर में क्या सम्बन्ध है, इसमें
हिन्दू दर्शनों की सोच अलग अलग है।
अद्वैत वेदान्त के अनुसार जब मानव
ब्रह्म को अपने मन से जानने
की कोशिश करता है, तब ब्रह्म ईश्वर
हो जाता है, क्योंकि मानव माया
नाम की एक जादुई शक्ति के वश मे
रहता है। अर्थात जब माया के आइने में
ब्रह्म की छाया पड़ती है, तो ब्रह्म
का प्रतिबिम्ब हमें ईश्वर के रूप में
दिखायी पड़ता है। ईश्वर
अपनी इसी जादुई शक्ति "माया" से
विश्व की सृष्टि करता है और उस पर
शासन करता है। इस स्तिथी में
हालाँकि ईश्वर एक नकारात्मक
शक्ति के साथ है, लेकिन
माया उसपर अपना कुप्रभाव
नहीं डाल पाती है, जैसे एक जादूगर
अपने ही जादू से अचंम्भित
नहीं होता है। माया ईश्वर
की दासी है, परन्तु हम
जीवों की स्वामिनी है। वैसे
तो ईश्वर रूपहीन है, पर
माया की वजह से वो हमें कई
देवताओं के रूप में प्रतीत हो सकता है।
इसके विपरीत वैष्णव मतों और
दर्शनों में माना जाता है कि ईश्वर
और ब्रह्म में कोई फ़र्क नहीं है--और
विष्णु (या कृष्ण) ही ईश्वर हैं। न्याय,
वैषेशिक और योग दर्शनों के अनुसार
ईश्वर एक परम और सर्वोच्च आत्मा है,
जो चैतन्य से युक्त है और विश्व
का सृष्टा और शासक है।
जो भी हो, बाकी बातें सभी हिन्दू
मानते हैं : ईश्वर एक और केवल एक है।
वो विश्वव्यापी और विश्वातीत
दोनो है। बेशक, ईश्वर सगुण है।
वो स्वयंभू और विश्व का कारण
(सृष्टा) है। वो पूजा और
उपासना का विषय है। वो पूर्ण,
अनन्त, सनातन, सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है।
वो राग-द्वेष से परे है, पर अपने
भक्तों से प्रेम करता है और उनपर
कृपा करता है। उसकी इच्छा के
बिना इस दुनिया में एक
पत्ता भी नहीं हिल सकता।
वो विश्व की नैतिक
व्यवस्था को कायम रखता है और
जीवों को उनके कर्मों के अनुसार
सुख-दुख प्रदान करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार विश्व
में नैतिक पतन होने पर वो समय-समय
पर धरती पर अवतार (जैसे कृष्ण) रूप ले
कर आता है। ईश्वर के अन्य नाम हैं :
परमेश्वर, परमात्मा, विधाता,
भगवान (जो हिन्दी मे सबसे
ज़्यादा प्रचलित है)। इसी ईश्वर
को मुसल्मान (अरबी में) अल्लाह,
(फ़ारसी में) ख़ुदा, ईसाई (अंग्रेज़ी में)
गॉड और यहूदी (इब्रानी में) याह्वेह
कहते हैं।
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015
ब्रह्म
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