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मंगलवार, 3 मार्च 2015

हनुमानजी के 10 रहस्य 2

पाँचवाँ रहस्य
कहां रहते हैं हनुमानजी? :
हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत
पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद्
भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है
कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत
पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे
थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के
लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे,
जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और
फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर
दिया था।
''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत
मस्तकान्जलि। वाष्प वारि परिपूर्ण
लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥''
अर्थात : कलियुग में जहां-
जहां भगवान श्रीराम की कथा-
कीर्तन इत्यादि होते हैं,
वहां हनुमानजी गुप्त रूप से
विराजमान रहते हैं। सीताजी के
वचनों के अनुसार- 'अजर-अमर गुन
निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक
छोऊ।।' गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन :
गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई
पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है।
महाभारत की पुरा-कथाओं में
भी गंधमादन पर्वत का वर्णन
प्रमुखता से आता है। हिन्दू
मान्यताओं के अनुसार
माना जाता है कि यहां के
विशालकाय पर्वतमाला और वन
क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में
श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने
भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत
के शिखर पर किसी भी वाहन से
नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में
ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर,
देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर
निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक
विचरण करते हैं। वर्तमान में कहां है
गंधमादन पर्वत? : इसी नाम से एक और
पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है,
जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने
के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम
उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम
बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश
पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार
पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की।
यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था।
सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में
स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस
काल में गंधमादन पर्वत
कहा जाता था। आज यह क्षेत्र
तिब्बत के इलाके में है। पुराणों के
अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और
भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत
कहा गया है, जो अपने सुगंधित
वनों के लिए प्रसिद्ध था। कैसे पहुंचे
गंधमादन : पुराणों के अनुसार
जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और
भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत
कहा गया है, जो अपने सुगंधित
वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र
में दो रास्तों से
जाया जा सकता है। पहला नेपाल के
रास्ते मानसरोवर से आगे और
दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे
और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन
होते हुए। संभवत महाभारत काल में
अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब
हनुमानजी से भेंट की थी,
तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल
के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे।
गौरतलब है कि एक गंधमादन पर्वत
उड़िसा में भी बताया जाता है
लेकिन हम उस पर्वत की बात नहीं कर
रहे हैं।

छेवाँ रहस्य
मकरध्वज था हनुमानजी का पुत्र :
अहिरावण के सेवक मकरध्वज थे। मकरध्वज
को अहिरावण ने पाताल पुरी का रक्षक
नियुक्त कर दिया था।
पवनपुत्र हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे तब
कैसे कोई उनका पुत्र हो सकता है?
वाल्मीकि रामायण के अनुसार उनके पुत्र
की कथा हनुमानजी के लंकादहन से
जुड़ी है। कथा जानने के लिए आगे क्लिक
करे... कौन था हनुमानजी का पुत्र,
जानिए:
हनुमानजी की ही तरह मकरध्वज भी वीर,
प्रतापी, पराक्रमी और महाबली थे।
हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु
श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और
मकरध्वज को पाताल लोक
का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के
मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी थी।

सातवाँ रहस्य
क्यों सिन्दूर चढ़ता है हनुमानजी को? :
हनुमानजी को सिन्दूर बहुत ही प्रिय है।
इसके पीछे ये कारण बताया जाता है
कि एक दिन भगवान
हनुमानजी माता सीता के कक्ष में पहुंचे।
उन्होंने देखा माता लाल रंग की कोई
चीज मांग में सजा रही है। हनुमानजी ने
जब माता से पूछा, तब माता ने
कहा कि इसे लगाने से प्रभु राम की आयु
बढ़ती है और प्रभु का स्नेह प्राप्त
होता है।
तब हनुमानजी ने सोचा जब माता इतना-
सा सिन्दूर लगाकर प्रभु का इतना स्नेह
प्राप्त कर रही है तो अगर मैं इनसे
ज्यादा लगाऊं तो मुझे प्रभु का स्नेह,
प्यार और ज्यादा प्राप्त होगा और प्रभु
की आयु भी लंबी होगी। ये सोचकर
उन्होंने अपने सारे शरीर में सिन्दूर का लेप
लगा लिया। इसलिए कहा जाता है
कि भगवान हनुमानजी को सिन्दूर
लगाना बहुत पसंद है।

आठवॉं रहस्य
पहली हनुमान स्तुति :
हनुमानजी की प्रार्थना में
तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग
बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र
लिखे, लेकिन
हनुमानजी की पहली स्तुति किसने
की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई
संतों और साधुओं ने
हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है।
लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले
हनुमानजी की स्तुति किसने की थी?
जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब
उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए
नहीं जलाया,
क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया
था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन
इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण
के भवन के द्वार पर
तुलसी का पौधा लगा था। भगवान
विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और
गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह
कि उनके घर के ऊपर 'राम' नाम अंकित
था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन
को नहीं जलाया।
विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव
ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट
बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और
उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया।
हनुमानजी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट
बताकर शरणागति देने की वकालत की।
इस पर श्रीरामजी ने विभीषण
को शरणागति न देने के सुग्रीव के प्रस्ताव
को अनुचित बताया और हनुमानजी से
कहा कि आपका विभीषण को शरण
देना तो ठीक है किंतु उसे शिष्ट
समझना ठीक नहीं है।
इस पर श्री हनुमानजी ने कहा कि तुम
लोग विभीषण को ही देखकर
अपना विचार प्रकट कर रहे हो मेरी ओर से
भी तो देखो, मैं क्यों और
क्या चाहता हूं...। फिर कुछ देर
हनुमानजी ने रुककर कहा- जो एक बार
विनीत भाव से मेरी शरण
की याचना करता है और कहता है- 'मैं
तेरा हूं, उसे मैं अभयदान प्रदान कर देता हूं।
यह मेरा व्रत है इसलिए विभीषण
को अवश्य शरण दी जानी चाहिए।'
इंद्रादि देवताओं के बाद धरती पर
सर्वप्रथम विभीषण ने
ही हनुमानजी की शरण लेकर
उनकी स्तुति की थी। विभीषण
को भी हनुमानजी की तरह
चिरंजीवी होने का वरदान मिला है। वे
भी आज सशरीर जीवित हैं। विभीषण ने
हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत
और अचूक स्तोत्र की रचना की है।
विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र
को 'हनुमान वडवानल स्तोत्र कहते हैं।
सब सुख लहे तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।
हनुमान की शरण में भयमुक्त जीवन :
हनुमानजी ने सबसे पहले सुग्रीव
को बाली से बचाया और सुग्रीव
को श्रीराम से मिलाया। फिर उन्होंने
विभीषण को रावण से बचाया और
उनको राम से मिलाया।
हनुमानजी की कृपा से
ही दोनों को ही भयमुक्त जीवन और
राजपद मिला। इसी तरह हनुमानजी ने
अपने जीवन में कई राक्षसों और साधु-
संतों को भयमुक्त और जीवनमुक्त किया है।

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