Google

Google

गुरुवार, 7 मई 2015

क्रुष्ण

कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार हैं।
हिन्दू श्रीकृष्ण को ईश्वर मानते हैं
और उन पर अपार श्रद्धा रखते हैं।
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु
सर्वपापहारी पवित्र और समस्त
मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान
करने वाले प्रमुख देवता हैं। जब-जब इस
पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों
का आतंक व्याप्त होता है तब-तब
भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में
अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम
करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी
तक तेईस अवतारों को धारण
किया। इन अवतारों में उनके सबसे
महत्वपूर्ण अवतार श्रीराम और
श्रीकृष्ण के ही माने जाते हैं।
जन्म
यह अवतार उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर के
अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में
देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में
लिया था। वास्तविकता तो यह
थी इस समय चारों ओर पापकृत्य हो
रहे थे। धर्म नाम की कोई भी चीज
नहीं रह गई थी। अतः धर्म को
स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण
अवतरित हुए थे। ब्रह्मा , विष्णु तथा
शिव-प्रभृत्ति देवता जिनके
चरणकमलों का ध्यान करते थे, ऐसे
श्रीकृष्ण का गुणानुवाद अत्यंत
पवित्र है। श्रीकृष्ण से ही प्रकृति
उत्पन्न हुई। सम्पूर्ण प्राकृतिक पदार्थ,
प्रकृति के कार्यकार्य किया उसे
अपना महत्वपूर्ण कर्म समझा, अपने
कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने
साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग
किया, क्योंकि उनके अवतीर्ण होने
का मात्र एक उद्देश्य था कि इस
पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया
जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के
लिए उन्होंने जो भी उचित समझा
वही किया। उन्होंने कर्मव्यवस्था
को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की
रणभूमि में अर्जुन को कर्मज्ञान देते हुए
उन्होंने गीता की रचना की जो
कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण
ग्रंथ माना जाता है।
संपूर्ण पृथ्वी दुष्टों एवं पतितों के
भार से पीड़ित थी। उस भार को
नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने एक
प्रमुख अवतार ग्रहण किया जो
कृष्णावतार के नाम से संपूर्ण संसार में
प्रसिद्ध हुआ। उस समय धर्म, यज्ञ,
दया पर राक्षसों एवं दानवों
द्वारा आघात पहुँचाया जा रहा
था।
पृथ्वी पापियों के बोझ से पूर्णतः
दब चुकी थी। समस्त देवताओं द्वारा
बारम्बार भगवान विष्णु की
प्रार्थना की जा रही थी। विष्णु
ही ऐसे देवता थे, जो समय-समय पर
विभिन्न अवतारों को ग्रहण कर
पृथ्वी के भार को दूर करने में सक्षम थे
क्योंकि प्रत्येक युग में भगवान विष्णु
ने ही महत्वपूर्ण अवतार ग्रहण कर दुष्ट
राक्षसों का संहार किया। वैवस्वत
मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में
भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण
अवतरित हुए। हिन्दू कालगणना के
अनुसार कृष्ण का जन्म आज से लगभग
5,235 वर्ष पूर्व हुआ था, कई
वैज्ञानिकों तथा पुराणो का यही
मानना है। जो महाभारत युद्ध की
कालगणना से मेल खाता है। [1]
भगवान कृष्ण के जन्म का सटीक
अंदाजा शायद ही कोई लगा पाए।
इस विषय पर कई मतभेद हैं परंतु
सारगर्भित ध्यान डालें तो सारे
नतीजे अपने स्थान पर सत्य हैं।
भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध के
द्वितीय अध्याय के अनुसार कलियुग
के आरंभ के संदर्भ में भारतीय गणना के
अनुसार कलयुग का शुभारंभ ईसा से
3102 वर्ष पूर्व 20 फ़रवरी को 2 बजकर
27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था।
पुराणों में बताया गया है कि जब
श्री कृष्ण का स्वर्गवास हुआ तब
कलयुग का आगमन हुआ, इसके अनुसार
कृष्ण जन्म 4,500 से 3,102 ई° पूर्व के
बीच मानना ठीक रहेगा। इस गणना
को सत्यापित करने वाली खोज
मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में
1929 में हुई। मैके द्वारा
मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में एक
पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) मिला
जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बच्चे
का चित्र बना हुआ था, जो हमें
भागवत आदि पुराणों में लिखे कृष्ण
द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की
कथा के ओर ले जाता है। इसके
अनुसार महाभारत का युद्ध 3000 ई°
पूर्व हुआ होगा जो पुराणों की
गणना में सटीक बैठता है। [2] इससे
कृष्ण जन्म का सटीक अंदाजा
मिलता है।
श्रीकृष्ण से सृष्टि का आरंभ
इस संदूक को: देखें • संवाद • संपादन
हिन्दू धर्म
पर एक श्रेणी का भाग
इतिहास
· देवता
सम्प्रदाय
· आगम
विश्वास और दर्शनशास्त्र
पुनर्जन्म
· मोक्ष
कर्म
· पूजा
· माया
दर्शन
· धर्म
वेदान्त
· योग
शाकाहार
· आयुर्वेद
युग
· संस्कार
भक्ति {{ हिन्दू दर्शन }}
ग्रन्थ
वेदसंहिता
· वेदांग
ब्राह्मणग्रन्थ
· आरण्यक
उपनिषद्
· श्रीमद्भगवद्गीता
रामायण
· महाभारत
सूत्र
· पुराण
शिक्षापत्री
· वचनामृत
सम्बन्धित विषय
दैवी धर्म
·
विश्व में हिन्दू धर्म
गुरु
· मन्दिर देवस्थान
यज्ञ
· मन्त्र
शब्दकोष
· हिन्दू पर्व
विग्रह
प्रवेशद्वार: हिन्दू धर्म
हिन्दू मापन प्रणाली
भगवान ने देखा कि संपूर्ण विश्व
शून्यमय है। कहीं कोई जीव-जन्तु नहीं
है। जल का भी कहीं पता नहीं है।
संपूर्ण आकाश वायु से रहित और
अंधकार से आवृत्त हो घोर प्रतीत हो
रहा है। वृक्ष, पर्वत और समुद्र आदि
शून्य होने के कारण विकृताकार
जान पड़ता है। मूर्ति, धातु, शस्य
तथा तृण का सर्वथा अभाव हो गया
है। इस प्रकार जगत् को शून्य अवस्था
में देख अपने हृदय में सभी बातों की
आलोचना करके दूसरे किसी सहायक
से रहित एकमात्र स्वेच्छामय प्रभु ने
स्वेच्छा से ही इस सृष्टि की रचना
प्रारंभ की।
सर्वप्रथम उन परम पुरुष श्रीकृष्ण के
दक्षिण पार्श्व से जगत के कारण रूप
तीन मूर्तिमान गुण प्रकट हुए। उन
गुणों से महत्तत्त्व अहंकार पांच
तन्मात्राएं रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द
ये पांच विषय क्रमशः प्रकट हुए। इसके
उपरान्त ही श्रीकृष्ण से साक्षात
भगवान नारायण का प्रादुर्भाव
हुआ। जिनकी अंगकान्ति श्याम थी,
वे नित्य तरुण पीताम्बरधारी और
विभिन्न वनमालाओं से विभूषित थे।
उनकी चार भुजाएं थीं, उन भुजाओं में
क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म
विराजमान थे। उनके मुखारबिन्द पर
मंद-मंद मुस्कान की छटा छा रही
थी। वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित
थे। शांर्गधनुष धारण किए हुए थे।
कौस्तुभ मणि उनके वक्षस्थल की
शोभा बढ़ा रही थी।
श्रीवत्सभूषित वक्ष में साक्षात
लक्ष्मी का निवास था। वे
श्रीनिधि अपूर्व शोभा को प्रस्तुत
कर रहे थे। शरत्काल की पूर्णिमा के
चंद्रमा की प्रभा से सेवित मुखचन्द्र
के कारण वे मनोहर जान पड़ते थे।
कामदेव की कान्ति से युक्त रूप-
लावण्य उनके सौंदर्य को और भी
बढ़ा रहा था। नारायण श्रीकृष्ण के
समक्ष खड़े होकर दोनों हाथों को
जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।
गीताजी में भी भगवान ने अर्जुन को
बताया की " मयाध्यक्षेण प्रकृतिम
सूयते स चराचरम | ", अर्थात मेरी
अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चराचर
जगत अर्थात सृष्टि की रचना करती
है | कृष्ण ने ही अर्जुन को भगवद्गीता
का सन्देश सुनाया था।
उनकी कथा कृष्णावतार में मिलती
है।
यदुकुल के राजा।
अचिन्त्य भेदाभेद दर्शन के अनुसार
परब्रह्म का दूसरा नाम।
कृष्ण लीलाओं में छिपा संदेश
श्रीकृष्ण लीलाओं का जो विस्तृत
वर्णन भागवत ग्रंथ मे किया गया है,
उसका उद्देश्य क्या केवल कृष्ण भक्तों
की श्रद्धा बढ़ाना है या मनुष्य
मात्र के लिए इसका कुछ संदेश है?
तार्किक मन को विचित्र-सी लगने
वाली इन घटनाओं के वर्णन का
उद्देश्य क्या ऐसे मन को
अतिमानवीय पराशक्ति की
रहस्यमयता से विमूढ़वत बना देना है
अथवा उसे उसके तार्किक स्तर पर ही
कुछ गहरा संदेश देना है, इस पर हमें
विचार करना चाहिए।
श्री कृष्ण एक ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं,
इसका स्पष्ट प्रमाण हमें छान्दोग्य
उपनिषद के एक उल्लेख में मिलता है।
वहां (3.17.6) कहा गया है कि
देवकी पुत्र श्रीकृष्ण को
महर्षिदेव:कोटी आंगिरस ने
निष्काम कर्म रूप यज्ञ उपासना की
शिक्षा दी थी, जिसे ग्रहण कर
श्रीकृष्ण 'तृप्त' अर्थात पूर्ण पुरुष हो
गए थे। श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि
महाभारत में वर्णित है, इसी शिक्षा
से अनुप्राणित था और गीता में
उसी शिक्षा का प्रतिपादन उनके
ही माध्यम से किया गया है।
किंतु इनके जन्म और बाल-जीवन का
जो वर्णन हमें प्राप्त है वह मूलतः
श्रीमद् भागवत का है और वह
ऐतिहासिक कम, आध्यात्मिक
अधिक है और यह बात ग्रंथ के
आध्यात्मिक स्वरूप के अनुसार ही है।
ग्रंथ में चमत्कारी भौतिक वर्णनों के
पर्दे के पीछे गहन आध्यात्मिक संकेत
संजोए गए हैं।
वस्तुतः भागवत में सृष्टि की संपूर्ण
विकास प्रक्रिया का और उस
प्रक्रिया को गति देने वाली
परमात्म शक्ति का दर्शन कराया
गया है। ग्रंथ के पूर्वार्ध (स्कंध 1 से 9)
में सृष्टि के क्रमिक विकास (जड़-
जीव-मानव निर्माण) का और
उत्तरार्ध (दशम स्कंध) में श्रीकृष्ण की
लीलाओं के द्वारा व्यक्ति के
आध्यात्मिक विकास का वर्णन
प्रतीक शैली में किया गया है।
भागवत में वर्णित श्रीकृष्ण लीला के
कुछ मुख्य प्रसंगों का आध्यात्मिक
संदेश पहचानने का यहाँ प्रयास
किया गया है।
श्रीकृष्ण जन्म
कृष्णके जन्मकाल की कुछ घटनाओं का
निरूपण
त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती
चेतना सत्ता!
श्रीकृष्ण आत्म तत्व के मूर्तिमान रूप
हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण
विकास ही आत्म तत्व की जागृति
है। जीवन प्रकृति से उद्भुत और
विकसित होता है अतः
त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में
श्रीकृष्ण की भी तीन माताएँ हैं। 1-
रजोगुणी प्रकृतिरूप देवकी
जन्मदात्री माँ हैं, जो सांसारिक
माया गृह में कैद हैं। 2- सतगुणी
प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके
वात्सल्य प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण
बड़े होते हैं। 3- इनके विपरीत एक घोर
तमस रूपा प्रकृति भी शिशुभक्षक
सर्पिणी के समान पूतना माँ है,
जिसे आत्म तत्व का प्रस्फुटित अंकुरण
नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का
अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान
कराती है। यहाँ यह संदेश प्रेषित
किया गया है कि प्रकृति का तमस-
तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने
में असमर्थ है।
गोकुल-वृंदावन की लीलाएँ
संभवत: रज्मनामा की पाण्डुलिपि
से उद्धृत चित्र
शिशु और बाल वय में ही श्रीकृष्ण
द्वारा अनेक राक्षसों के वध की
लीलाओं तथा सहज-सरल-हृदय
मित्रों और ग्रामवासियों में आनंद
और प्रेम बांटने वाली क्रीड़ाओं का
विस्तृत वर्णन भागवत में हुआ है। शिशु
चरित्र गोकुल में और बाल चरित्र
वृंदावन में संपन्न होने का जो उल्लेख
है, वह आध्यात्मिक अर्थ की ओर संकेत
करता है।
गो-शब्द का अर्थ इंद्रियाँ भी हैं,
अतः गोकुल से आशय है हमारी
पंचेद्रियों का संसार और वृंदावन का
अर्थ है तुलसीवन अर्थात मन का उच्च
क्षेत्र (तुरीयावस्था वाले 'तुर' से
'तुरस' और 'तुलसी' शब्द की व्युत्पत्ति
व्याकरणसम्मत है)। गोकुल में पूतना वध,
शकट भंजन और तृणावर्त वध का तथा
वृंदावन में बकासुर, अधासुर और
धेनुकासुर आदि अनेक राक्षसों के हनन
का वर्णन है।
व्यक्ति और समाज को अपने अंदर
व्याप्त आसुरी वृत्तियों के रूप में
इनकी पहचान करना होगा तभी
आध्यात्मिक-नैतिक शक्ति से इनका
हनन संभव होगा और तब ही इस
बालरूप श्रीकृष्ण का उद्भव
महाभारत के सूत्रधार, धर्मस्थापक,
श्रीकृष्ण के रूप में होना संभव होगा।
वृंदावन की कथाओं में कालिया
नाग , गोवर्धन , रासलीला और
महारास वाली कथाएं अधिक
प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण ने यमुना को
कालिया नाग से मुक्त-शुद्ध किया
था। यमुना, गंगा, सरस्वती नदियों
को क्रमशः कर्म, भक्ति और ज्ञान
की प्रतीक माना गया है। ज्ञान
अथवा भक्ति के अभाव मेंकर्म का
परिणाम होता है, कर्ता में कर्तापन
के अहंकार-विष का संचय। यह अहंकार
ही कर्म-नद यमुना का कालिया
नाग है। सर्वात्म रूप श्रीकृष्ण भाव
का उदय इस अहंकार-विष से कर्म और
कर्ता की रक्षा करता है (गीता-
18.55.58)।
गोवर्धन धारण कथा की आर्थिक,
नीति-परक और राजनीतिक
व्याख्याएं की गई हैं। इस कथा का
आध्यात्मिक संकेत यह दिखता है कि
गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन
(पालन-पोषण) कर्ता, अर्थात
इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-
शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी
दृष्टि होना चाहिए। इसी प्रकार
गोपियों के साथ रासलीला के
वर्णन में मन की वृत्तियां ही
गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं
और प्रत्येक वृत्ति के आत्म-रस से
सराबोर होने को रासलीला या
रसनृत्य के रूप में चित्रित किया गया
है। इससे भी उच्च अवस्था का- प्रेम
और विरह के बाह्य द्वैत का एक
आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने
की अवस्था का वर्णन 'महारास' में
हुआ है।
मथुरा आगमन और कंस वध
मथुराके लिए अपने रास्ते पर कृष्ण और
बलराम
श्रीकृष्ण को किशोर वय होते न
होते कंस उन्हें मरवा डालने का एक
बार फिर षड्यंत्र रचकर मथुरा
बुलवाता है, किंतु श्रीकृष्ण उसको
उसके महाबली साथियों सहित मार
डालते हैं। कंस शब्द का अर्थ और
उसकी कथा भी संकेत करती है कि
कंस देहासक्ति का मूर्तिमान रूप है,
जो संभावित मृत्यु से बचने के लिए
कितने ही कुत्सित कर्म करता है।
मथुरा का शब्दार्थ है- 'विक्षुब्ध
किया हुआ।' अतः मथुरा है
देहासक्ति से विक्षुब्ध मन। श्रीकृष्ण
का कंस वध करने के उपरांत द्वारिका
में राज्य स्थापना करने का अर्थ है
कि आत्मभाव में प्रवेश के पूर्व
देहासक्ति की समाप्ति आवश्यक है।
समुद्र में द्वारिका निर्माण और
राज्य स्थापना
कंस वध के बाद श्रीकृष्ण समुद्र के
भीतर (अंतः समुद्रे-भा. 10/50/50)
द्वारिका का निर्माण करवाते हैं
और वहां राज्य स्थापित करते हैं।
इतिहास के महापुरुष श्रीकृष्ण
द्वारा द्वारका नगर का समुद्र
किनारे या द्वीप पर निर्माण
करवाना और कालांतर में उसका
समुद्र में डूब जाना (जिसके कुछ अवशेष
अभी हाल में ही खोजे गए हैं) उस
काल की वास्तविक घटना होगी,
किंतु भागवत ने 'समुद्र के अंदर'
द्वारिका निर्माण का वर्णन करके
स्पष्टतः यहां उसका आध्यात्मिक
रूपांतरण प्रस्तुत किया है।
द्वारिका शब्द में द्वार का अर्थ है-
साधन, उपाय या प्रवेश मार्ग। समुद्र
व्यक्तित्व के गहरे तल- आत्म क्षेत्र को
इंगित करता है। अतः आत्म क्षेत्र का
प्रवेश द्वार है द्वारिका। इस क्षेत्र में
चेतना का प्रवेश होने पर जीवन जीने
का जैसा स्वरूप होगा, उसका
निरूपण द्वारिका पर श्रीकृष्ण
राज्य के रूप में किया गया है। इस
क्षेत्र का परिचय हमें महाभारत में
श्रीकृष्ण के लोकहितार्थ और
धर्मस्थापनार्थ किए गए कार्यों
द्वारा तथा गीता के अंतर्गत उनकी
वाणी द्वारा कराया गया है।
सारांश यह कि व्यक्ति भी संकल्प
करे तो उसकी चेतना भी कृष्ण सम
विकसित हो सकती है। श्रीकृष्ण
जिनका नाम है, गोकुल जिनका
धाम है! ऐसे श्री भग्वान देव:कोटी
को बरम्बार प्रनाम है !!!!
महाभारत
कृष्ण द्वारा शंखनाद करके महाभारत
युद्ध के अंत की घोषणा
मुख्य लेख : महाभारत
श्री कृष्ण की महाभारत में भी बहुत
बड़ी भूमिका थी। वे महाभारत के
युद्ध में अर्जुन के सारथी थे। उनकी
बहन सुभद्रा अर्जुन की पत्नी थीं।
श्री कृष्ण ने ही युद्ध से पहले अर्जुन
को गीता उपदेश दिया था।