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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

नवरात्रि से जुड़ी नो कथाएँ एवंम देवीया दूसरी कथा ब्रह्मचारिणी देवी की

नवरात्रि से जुड़ी नो कथाएँ एवंम देवीया दूसरी कथा ब्रह्मचारिणी देवी की

दुर्गा की नव शक्तियों में दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी जी का है जिनका नवरात्र के द्वितीय दिन अर्चन किया जाता है। हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मचारिणी में 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रहमचारिणी अर्थात् तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। कहा भी है- वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म - वेद, तत्त्व और तप ' ब्रह्म ' शब्द के ही अर्थ हैं। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु रहता है। अपने पूर्वजन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद के उपदेश से इन्होंने भगवान् शङ्करजी को पति-रूप में प्राप्त करने के लिये अत्यन्त कठिन तपस्या की थी । इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी के नाम से अभिहित किया गया।
एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल-मूल खाकर व्यतीत किये थे। सौ वर्षों तक केवल शाक निर्वाह किया था। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे। इस कठिन तपश्चर्या के बाद तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वह अहर्निश भगवान् शिवजी की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रों को खाना भी छोड़ दिया। कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं। पत्तों (पर्ण) को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम ' अपर्णा' भी पड़ गया।
कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो गया। वह अत्यन्त कृशकाय हो गयी थीं। उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मेना अत्यन्त दुःखित हो उठीं। उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिये आवाज दी-" उ मा, अरे! नहीं, ओ! नहीं! " तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम ' उमा ' भी पड़ गया था।
उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व बतलाते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें संबोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा-" हे देवि! आज तक किसी ने भी ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। ऐसी तपस्या तुम्हीं से सम्भव थी। तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चतुर्दिक सराहना हो रही है। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन परिपूर्ण होगी। भगवान् चन्द्रमौलि शिवजी तुम्हें पतिरूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।"
माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में
तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता है। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे
सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ' स्वाधिष्ठान ' चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित चित्त वाला योगी ब्रह्मचारिणी जी की कृपा व भक्ति सहज ही प्राप्त कर लेता है।
नवरात्रि के द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी जी का इस ध्यानमन्त्र द्वारा अर्चन करें-
दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
अर्थात्
जो दोनों करकमलों में अक्षमाला व कमण्डलु धारण करती हैं, वे सर्वश्रेष्ठा ब्रह्मचारिणी दुर्गा देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
देवी माँ का यह ध्यान, मन्त्र-स्वरूप है, नवरात्र के दूसरे दिन इसका 11 या 21 या 28 या 108 बार या निरन्तर मानस जप करें।
नवरात्र के दूसरे दिन अर्थात् द्वितीया तिथि को ब्रह्मचारिणी दुर्गा माँ को चीनी का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और पूजन के पश्चात इसको ब्राह्मण को दे दें, मान्यता है कि इससे व्यक्ति की आयु में वृद्धि होती है।

दुर्गा की नव शक्तियों में दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी जी का है जिनका नवरात्र के द्वितीय दिन अर्चन किया जाता है। हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मचारिणी में 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रहमचारिणी अर्थात् तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। कहा भी है- वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म - वेद, तत्त्व और तप ' ब्रह्म ' शब्द के ही अर्थ हैं। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु रहता है। अपने पूर्वजन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद के उपदेश से इन्होंने भगवान् शङ्करजी को पति-रूप में प्राप्त करने के लिये अत्यन्त कठिन तपस्या की थी । इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी के नाम से अभिहित किया गया।
एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल-मूल खाकर व्यतीत किये थे। सौ वर्षों तक केवल शाक निर्वाह किया था। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे। इस कठिन तपश्चर्या के बाद तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वह अहर्निश भगवान् शिवजी की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रों को खाना भी छोड़ दिया। कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं। पत्तों (पर्ण) को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम ' अपर्णा' भी पड़ गया।
कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो गया। वह अत्यन्त कृशकाय हो गयी थीं। उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मेना अत्यन्त दुःखित हो उठीं। उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिये आवाज दी-" उ मा, अरे! नहीं, ओ! नहीं! " तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम ' उमा ' भी पड़ गया था।
उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व बतलाते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें संबोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा-" हे देवि! आज तक किसी ने भी ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। ऐसी तपस्या तुम्हीं से सम्भव थी। तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चतुर्दिक सराहना हो रही है। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन परिपूर्ण होगी। भगवान् चन्द्रमौलि शिवजी तुम्हें पतिरूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।"
माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में
तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता है। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे
सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ' स्वाधिष्ठान ' चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित चित्त वाला योगी ब्रह्मचारिणी जी की कृपा व भक्ति सहज ही प्राप्त कर लेता है।
नवरात्रि के द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी जी का इस ध्यानमन्त्र द्वारा अर्चन करें-
दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
अर्थात्
जो दोनों करकमलों में अक्षमाला व कमण्डलु धारण करती हैं, वे सर्वश्रेष्ठा ब्रह्मचारिणी दुर्गा देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
देवी माँ का यह ध्यान, मन्त्र-स्वरूप है, नवरात्र के दूसरे दिन इसका 11 या 21 या 28 या 108 बार या निरन्तर मानस जप करें।
नवरात्र के दूसरे दिन अर्थात् द्वितीया तिथि को ब्रह्मचारिणी दुर्गा माँ को चीनी का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और पूजन के पश्चात इसको ब्राह्मण को दे दें, मान्यता है कि इससे व्यक्ति की आयु में वृद्धि होती है।

दुर्गा की नव शक्तियों में दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी जी का है जिनका नवरात्र के द्वितीय दिन अर्चन किया जाता है। हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मचारिणी में 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रहमचारिणी अर्थात् तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। कहा भी है- वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म - वेद, तत्त्व और तप ' ब्रह्म ' शब्द के ही अर्थ हैं। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु रहता है। अपने पूर्वजन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद के उपदेश से इन्होंने भगवान् शङ्करजी को पति-रूप में प्राप्त करने के लिये अत्यन्त कठिन तपस्या की थी । इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी के नाम से अभिहित किया गया।
एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल-मूल खाकर व्यतीत किये थे। सौ वर्षों तक केवल शाक निर्वाह किया था। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे। इस कठिन तपश्चर्या के बाद तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वह अहर्निश भगवान् शिवजी की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रों को खाना भी छोड़ दिया। कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं। पत्तों (पर्ण) को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम ' अपर्णा' भी पड़ गया।
कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो गया। वह अत्यन्त कृशकाय हो गयी थीं। उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मेना अत्यन्त दुःखित हो उठीं। उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिये आवाज दी-" उ मा, अरे! नहीं, ओ! नहीं! " तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम ' उमा ' भी पड़ गया था।
उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व बतलाते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें संबोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा-" हे देवि! आज तक किसी ने भी ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। ऐसी तपस्या तुम्हीं से सम्भव थी। तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चतुर्दिक सराहना हो रही है। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन परिपूर्ण होगी। भगवान् चन्द्रमौलि शिवजी तुम्हें पतिरूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।"
माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में
तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता है। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे
सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ' स्वाधिष्ठान ' चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित चित्त वाला योगी ब्रह्मचारिणी जी की कृपा व भक्ति सहज ही प्राप्त कर लेता है।
नवरात्रि के द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी जी का इस ध्यानमन्त्र द्वारा अर्चन करें-
दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
अर्थात्
जो दोनों करकमलों में अक्षमाला व कमण्डलु धारण करती हैं, वे सर्वश्रेष्ठा ब्रह्मचारिणी दुर्गा देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
देवी माँ का यह ध्यान, मन्त्र-स्वरूप है, नवरात्र के दूसरे दिन इसका 11 या 21 या 28 या 108 बार या निरन्तर मानस जप करें।
नवरात्र के दूसरे दिन अर्थात् द्वितीया तिथि को ब्रह्मचारिणी दुर्गा माँ को चीनी का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और पूजन के पश्चात इसको ब्राह्मण को दे दें, मान्यता है कि इससे व्यक्ति की आयु में वृद्धि होती है।

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